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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 19.42

आयु॑र्य॒ज्ञेन॑ कल्पतां प्रा॒णो य॒ज्ञेन॑ कल्पतां॒ चक्षु॑र्य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ श्रोत्रं॑ य॒ज्ञेन॑ कल्पताम् ।
वाग्य॒ज्ञेन॑ कल्पतां॒ मनो॑ य॒ज्ञेन॑ कल्पतामा॒त्मा य॒ज्ञेन॑ कल्पतां पृ॒ष्ठं य॒ज्ञेन॑ कल्पताम् ।
ब्रह्म॑ य॒ज्ञेन॑ कल्पतां य॒ज्ञो य॒ज्ञेन॑ कल्पतां ज्योति॑र्य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्व॑र्य॒ज्ञेन॑ कल्पताम् ॥३॥

पूरा अध्याय