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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 19.39

प॒ष्ठ॒वाट् च॑ मे पष्ठौ॒ही च॑ म उ॒क्षा च॑ मे व॒शा च॑ मे ।
ऋ॒ष॒भश्च॑ मे वे॒हच्च॑ मेऽन॒ड्वाᳪश्च॑ मे धे॒नुश्च॑ मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम् ॥४॥

पूरा अध्याय