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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 18.82

ऋ॒तश्च॑ स॒त्यश्च॑ ध्रु॒वश्च॑ ध॒रुण॑श्च । ध॒र्ता च॑ विध॒र्ता च॑ विधार॒यः ॥४॥

पूरा अध्याय