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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 18.7

६ (१००४)
उप॒ ज्मन्नुप॑ वेत॒सेऽव॑तर न॒दीष्वा ।
अग्ने॑ पि॒त्तम॒पाम॑सि॒ मण्डू॑कि॒ ताभि॒राग॑हि॒ सेमं नो॑ य॒ज्ञं पा॑व॒कव॑र्णᳪ शिवं कृ॑धि ॥७॥

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