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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 18.67

स्व॒र्यन्तो॒ नापे॑क्षन्त॒ आ द्याᳪ रो॑हन्ति॒ रोद॑सी ।
य॒ज्ञं ये वि॒श्वतो॑धारᳪ सुवि॑द्वाᳪसो वितेनि॒रे ॥४॥

पूरा अध्याय