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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 18.65

६५ (१०६३)
प्राची॒मनु॑ प्र॒दिशं॒ प्रेहि॑ वि॒द्वान॒ग्नेर॑ग्ने पु॒रो अ॑ग्निर्भवे॒ह ।
विश्वा॒ आशा॒ दीद्या॑नो॒ विभा॒ह्यूर्जं॑ नो धेहि द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे ॥२॥

पूरा अध्याय