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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 18.52

उदु॑ त्वा॒ विश्वे॑ दे॒वा अग्ने॒ भर॑न्तु॒ चित्ति॑भिः । स नो॑ भव शि॒वस्त्वᳪ सु॒प्रती॑को वि॒भाव॑सुः ॥४॥

पूरा अध्याय