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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 18.37

गो॒त्र॒भिदं॑ गो॒विदं॒ वज्र॑बाहुं॒ जय॑न्त॒मज्म॑ प्रमृ॒णन्त॒मोज॑सा ।
इ॒मᳪ स॑जाता॒ अनु॑ वीरयध्व॒मिन्द्र॑ᳪ सखायो॒ अनु॒ सँर॑भध्वम् ॥६॥

पूरा अध्याय