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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 18.16

(१)
अ॒ग्निस्ति॒ग्मेन॑ शो॒चिषा॒ यास॒द्विश्वं॒ न्य॒त्रिण॑म् । अ॒ग्निर्नो॑ वनते र॒यिम् ॥१॥

पूरा अध्याय