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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 17.51

मीळहु॑ष्टम॒ शिव॑तम शि॒वो नः॑ सु॒मना॑ भव ।
प॒र॒मे वृ॒क्ष आयु॑धं नि॒धाय॒ कृत्तिं॒ वसा॑न॒ आच॑र॒ पिना॑कं॒ बिभ्र॒दाग॑हि ॥५॥

पूरा अध्याय