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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 17.4

शि॒वेन॒ वच॑सा त्वा॒ गिरि॒शाच्छा॑ वदामसि । यथा॑ नः॒ सर्व॒मिज्जग॑दय॒क्ष्मᳪ सु॒मना॒ अस॑त् ॥४॥

पूरा अध्याय