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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 16.61

भ॒द्रा उ॒त प्रश॑स्तयो भ॒द्रं मनः॑ कृणुष्व वृत्र॒तूर्ये॑ । येना॑ स॒मत्सु॑ सा॒सहः॑ ॥२१॥

पूरा अध्याय