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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 14.7

या इष॑वो यातु॒धाना॑नां॒ ये वा॒ वन॒स्पती॒ᳪरनु॑ । ये वा॑व॒टेषु॒ शेर॑ते॒ तेभ्यः॑ स॒र्पेभ्यो॒ नमः॑ ॥७॥

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