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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 14.45

अज॑स्र॒मिन्दु॑मरु॒षं भु॑र॒ण्युम॒ग्निमी॑ळे पू॒र्वचि॑त्तिं॒ नमो॑भिः ।
स पर्व॑भिरृतु॒शः कल्प॑मानो॒ गां मा हि॑ᳪसी॒रदि॑तिं वि॒राज॑म् ॥६॥

पूरा अध्याय