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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 14.30

मधु॒ नक्त॑मु॒तोषसो॒ मधु॑म॒त्पार्थि॑व॒ᳪ रजः॑ । मधु॒ द्यौर॑स्तु नः पि॒ता ॥२॥

पूरा अध्याय