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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 13.81

यत्रौ॑षधीः स॒मग्म॑त॒ राजा॑नः॒ समि॑ता इव । विप्रः॒ स उ॑च्यते भि॒षग्र॑क्षो॒हामी॑व॒चात॑नः ॥६॥

पूरा अध्याय