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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 13.4

सु॒प॒र्णो॑ऽसि ग॒रुत्मा॑ᳪ स्त्रि॒वृत्ते॒ शिरः॑ । गाय॒त्रं चक्षु॑र्बृहद्रथन्त॒रे पक्षौ ॥४॥

पूरा अध्याय