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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 13.102

अ॒भ्या व॑र्तस्व पृथिवि य॒ज्ञेन॒ पय॑सा स॒ह ।
व॒पां ते॑ अ॒ग्निरि॑षि॒तो अ॑रोहत् ॥२॥

पूरा अध्याय