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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 12.54

मि॒त्रः स॒ᳪसृज्य॑ पृथि॒वीं भूमिं॑ च॒ ज्योति॑षा स॒ह ।
सुजा॑तं जा॒तवे॑दसमय॒क्ष्माय॑ त्वा॒ सᳪसृ॑जामि प्र॒जाभ्यः॑ ॥४॥

पूरा अध्याय