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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 11.47

यु॒वᳪ सु॒राम॑मश्विना॒ नमु॑चा आसु॒रे सचा॑ । वि॒पि॒पा॒ना शु॑भस्पती॒ इन्द्रं॒ कर्म॑स्वावतम् ॥३॥

पूरा अध्याय