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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 11.38

निष॑साद धृ॒तव्र॑तो॒ वरु॑णः प॒स्त्या॒स्वा । साम्रा॑ज्याय सु॒क्रतुः॑ ॥२॥

पूरा अध्याय