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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 10.35

अग्ने॒ अच्छा॑वदे॒ह नः॒ प्रति॑ नः सु॒मना॑ भव । प्र नो॑ यच्छ सहस्रजि॒त्त्वᳪहि ध॑न॒दा असि॑ ॥४॥

पूरा अध्याय