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वाल्मीकि रामायण 88.17

स ताः पप्रच्छ धर्मात्मा कस्यैषा लोकसुन्दरी ।
किमर्थमागता चैव सर्वमाख्यात मा चिरम् ।। ७.८८.१७ ॥

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