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वाल्मीकि रामायण 84.8

अकृष्टपच्या पृथिवी सुसम्पन्ना महात्मनः ।
स राज्यं तादृशं भुङ्क्ते स्फीतमद्भुतदर्शनम् ।। ७.८४.८ ॥

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