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वाल्मीकि रामायण 76.51

एवं ब्रुवति काकुत्स्थे मुनिर्वाक्यमथाब्रवीत् ।
शृणु राम यथावृत्तं पुरा त्रेतायुगे युगे ।। ७.७६.५१ ॥

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