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वाल्मीकि रामायण 76.49

अत्यद्भुतमिदं दिव्यं वपुषा युक्तमुत्तमम् ।
कथं वा भगवता प्राप्तं कुतो वा केन वा हृतम् ।। ७.७६.४९ ॥

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