ग्रंथवाल्मीकि रामायणउत्तरकाण्डसर्ग 7676.3वाल्मीकि रामायण 76.3न मिथ्या ऽहं वदे राम देवलोकजिगीषया । शूद्रं मां विद्धि काकुत्स्थ तप उग्रं समास्थितम् ।। ७.७६.३ ॥पिछलाअगलापूरा अध्याय