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वाल्मीकि रामायण 76.16

स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते साधु याम नरर्षभ ।
अगस्त्यस्याश्रमपदं द्रष्टुमिच्छाम राघव ।। ७.७६.१६ ॥

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