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वाल्मीकि रामायण 73.12

राजद्वारि मरिष्यामि पत्न्या सार्धमनाथवत् ।
ब्रह्महत्यां ततो राम समुपेत्य सुखी भव ।। ७.७३.१२ ॥

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