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वाल्मीकि रामायण 67.26

त्वं श्वः प्रभाते लवणं महात्मन्वधिष्यसे नात्र तु संशयो मे ।
शूलं विना निर्गतमामिषार्थे ध्रुवो जयस्ते भविता नरेन्द्र ।। ७.६७.२६ ।।

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