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वाल्मीकि रामायण 65.2

द्विरात्रमन्तरे शूर उष्य राघवनन्दनः ।
वाल्मीकेराश्रमं पुण्यमगच्छद्वासमुत्तमम् ।। ७.६५.२ ॥

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