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वाल्मीकि रामायण 6.47

स्यन्दनैर्वारणैश्चैव हयैश्च गिरिसन्निभैः ।
खरैर्गोभी रथोष्ट्रैश्च शिंशुमारैर्भुजङ्गमैः ।। ७.६.४७ ॥

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