ग्रंथवाल्मीकि रामायणउत्तरकाण्डसर्ग 66.15वाल्मीकि रामायण 6.15स त्वमस्मद्धितार्थाय जहि तान्मधुसूदन । शरणं त्वां वयं प्राप्ता गतिर्भव सुरेश्वर ।। ७.६.१६ ॥पिछलाअगलापूरा अध्याय