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वाल्मीकि रामायण 6.15

स त्वमस्मद्धितार्थाय जहि तान्मधुसूदन ।
शरणं त्वां वयं प्राप्ता गतिर्भव सुरेश्वर ।। ७.६.१६ ॥

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