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वाल्मीकि रामायण 57.2

निक्षिप्तदेहौ काकुत्स्थ कथं तौ द्विजपार्थिवौ ।
पुनर्देहेन संयोगं जग्मुर्देवसम्मतौ ।। ७.५७.२ ॥

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