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वाल्मीकि रामायण 54.2

अल्पापराधे काकुत्स्थ द्विजाभ्यां शाप ईदृशः ।
महान्नृगस्य राजर्षेर्यमदण्ड इवापरः ।। ७.५४.२ ॥

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