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वाल्मीकि रामायण 50.8

को नु धर्माश्रयः सूत कर्मण्यस्मिन्यशोहरे ।
मैथिलीं प्रतिसम्प्राप्तः पौरैर्हीनार्थवादिभिः ।। ७.५०.८ ॥

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