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वाल्मीकि रामायण 50.1

दृष्ट्वा तु मैथिलीं सीतामाश्रमे सम्प्रवेशिताम् ।
सन्तापमगमद्घोरं लक्ष्मणो दीनचेतनः ।। ७.५०.१ ॥

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