ग्रंथवाल्मीकि रामायणउत्तरकाण्डसर्ग 4848.24वाल्मीकि रामायण 48.24मुहुर्मुहुः परावृत्य दृष्ट्वा सीतामनाथवत् । चेष्टन्तीं परतीरस्थां लक्ष्मणः प्रययावथ ।। ७.४८.२४ ॥पिछलाअगलापूरा अध्याय