ग्रंथवाल्मीकि रामायणउत्तरकाण्डसर्ग 4848.19वाल्मीकि रामायण 48.19एवं ब्रुवन्त्यां सीतायां लक्ष्मणो दीनचेतनः । शिरसा ऽ ऽवन्द्य धरणीं व्याहर्तुं न शशाक ह ।। ७.४८.१९ ॥पिछलाअगलापूरा अध्याय