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वाल्मीकि रामायण 47.18

पतिव्रतात्वमास्थाय रामं कृत्वा सदा हृदि ।
श्रेयस्ते परमं देवि तथा कृत्वा भविष्यति ।। ७.४७.१८ ।।

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