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वाल्मीकि रामायण 46.1

ततो रजन्यां व्युष्टायां लक्ष्मणो दीनचेतनः ।
सुमन्त्रमब्रवीद्वाक्यं मुखेन परिशुष्यता ।। ७.४६.१ ॥

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