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वाल्मीकि रामायण 40.15

स्नेहो मे परमो राजंस्त्वयि तिष्ठतु नित्यदा ।
भक्तिश्च नियता वीर भावो नान्यत्र गच्छतु ।। ७.४०.१५ ॥

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