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वाल्मीकि रामायण 38.21

विसृज्य तं काशिपतिं त्रिशतं पृथिवीपतीन् ।
प्रहसन्राघवो वाक्यमुवाच मधुराक्षरम् ।। ७.३८.२१ ॥

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