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वाल्मीकि रामायण 37.4

वीर सौम्य प्रबुध्यस्व कौसल्याप्रीतिवर्धन ।
जगद्धि सर्वं स्वपिति त्वयि सुप्ते नराधिप ।। ७.३७.४ ॥

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