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वाल्मीकि रामायण 37.1

अभिषिक्ते तु काकुत्स्थे धर्मेण विदितात्मनि ।
व्यतीता या निशा पूर्वा पौराणां हर्षवर्धिनी ।। ७.३७.१ ॥

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