ग्रंथवाल्मीकि रामायणउत्तरकाण्डसर्ग 3333.17वाल्मीकि रामायण 33.17पुलस्त्याज्ञां प्रगृह्योचे न किञ्चन वचो ऽर्जुनः । मुमोच वै पार्थिवेन्द्रो राक्षसेन्द्रं प्रहृष्टवत् ।। ७.३३.१७ ॥पिछलाअगलापूरा अध्याय