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वाल्मीकि रामायण 32.47

तथा हतो ऽतिवेगेन प्रहस्तो गदया तदा ।
निपपात स्थितः शैलो वज्रिवज्रहतो यथा ।। ७.३२.४७ ॥

पूरा अध्याय