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वाल्मीकि रामायण 32.15

नदीं बाहुसहस्रेण रुन्धन्तमरिमर्दनम् ।
गिरिं पादसहस्रेण रुन्धन्तमिव मेदिनीम् ।। ७.३२.१५ ॥

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