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वाल्मीकि रामायण 22.35

स ज्वालापरिवारस्तु निर्दहन्निव राक्षसम् ।
तेन स्पृष्टो बलवता महाप्रहरणो ऽस्फुरत् ।। ७.२२.३६ ॥

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