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वाल्मीकि रामायण 22.19

राक्षसेन्द्रो ऽपि विस्फार्य चापमिन्द्राशनिप्रभम् ।
निरन्तरमिवाकाशं कुर्वन्बाणांस्ततो ऽसृजत् ।। ७.२२.२० ॥

पूरा अध्याय